Thursday, February 23, 2017

शिव

शिव ही शक्ति,
शिव ही भक्ति।
शिव ही मार्ग,
शिव ही मुक्ति।
शिव ही वायु,
शिव ही तल।
शिव अनंत,
शिव अटल।
शिव ही आदि,
शिव ही अंत।
शिव ही योगी,
शिव ही संत।
शिव ही कठोर,
शिव ही मर्म।
शिव ही ज्योति,
शिव ही धर्मं।
शिव ही उग्र,
शिव ही चन्दन।
शिव के चरणों में,
अभिनन्दन।

Wednesday, February 22, 2017

हैरानी


बात हैरानी की है,
ज़रा परेशानी की है।
समझो तो गम्भीर है,
वरना नादानी की है।
आखिर अधिकारी और चपरासी में,
क्या है अंतर ?
अधिकारी रहता बेफिक्र ,
तो चपरासी मस्त कलंदर।
अधिकारी की अपनी ,
खास सीट है।
तो चपरासी केबिन के बाहर,
फिट है।
अधिकारी हो मुंह फट - फूहड़।
तो चपरासी पड़ता है है लड़ झगड़।
दोनों के मुंह लगा पान,
वो भी एक ही दूकान का।
जी चाहा तो काम किया वर्ना इंटरवल,
सानी नहीं कोई शान का।
केवल एक अंतर जो समझ आता है ,
सोचने पर बार बार।
चपरासी को घूस देनी होती है दस -बीस ,
अधिकारी को दस -बीस हज़ार।।


Tuesday, February 21, 2017

मैं भी चोर तू भी चोर

क्यों करे चिल्लम-चिल्ली   
क्यों करे हम शोर।
गले मिल जाए बंधू
मैं भी चोर तू भी चोर।
कहानी बना ले धासु कोई
ब।हर मिडिया है घनघोर।
आपस में लड़ कर क्या फायदा
मैं पतंग तू डोर।
गले मिल जाए बंधू
मैं भी चोर तू भी चोर।।
     

Monday, February 20, 2017

पेंशन की फ़ाइल

 माँ के पेंशन की फ़ाइल साहब निपटाओ,
घर में बड़ी तंगी है ।
बाबू बोला दाँत दिखाकर,
बेटा दुनियाँ बड़ी भिखमंगी है ।
ऊपर तक खिलाना पड़ता है।
अपने हिस्से तो बस आठ आना पड़ता है ।
बोला युवक पैसे कहा से लाऊँगा,
दे दिया तो भूखा मर जाऊंगा ।
बाबू बोला माँ की छोड ,
देता जा अपने पेंशन की अर्जी ।

मुफ्त मे सलाह दिया ,
काम नहीं है फर्जी।
युवक बोला मगर मेरी नौकरी में ,
तीस साल बाकी है ।
बाबू बोला बिना चढ़ावा ,
ये भी ना काफी है।
अर्जी देता जा शायद ,
फ़ाइल तेरी निकल जाएगी ।
तुझे ना मिली तो ना मिली ,
तेरे बीवी को तेरी पेंशन मिल जाएगी ।
बीवी को पेंशन मिल जाएगी,
तेरे बेटे को जूता न घिसना पड़ेगा।
बाबु-अफसर के बीच,
ना पिसना पड़ेगा।
खाएगा वो अपने पैसे की अगर,
तो तेरे पेंशन से जेब खर्च के मज़े लेगा।
वरना ख्वामख्वाह ही सिस्टम को कोसेगा,
और तुझे गालियाँ देगा।

Sunday, February 19, 2017

उम्दा इंसान



ये महिना कुछ ज्यादा ही खीच गया है,
ख़त्म होने का नाम ही नहीं लेता।
राशन दूकान का बनिया रोज़ पैसे मांगता है,
सब्र से काम ही नहीं लेता
मझले बेटे का अंगूठा अब
जूतों में दबने लगा है।
बड़ी बेटी का सलवार अब
ज़रा छोटा लगने लगा है।
घरवाली के हाथ मिटटी से बर्तन धोते-धोते
खुरदरे हो गए है।
मोहल्ले वाले भी रोज़ चंदा मांगने आ जाते है,
सारे के सारे मसखरे हो गए है।
मेरी साइकिल कुछ ज्यादा ही पुरानी हो गई है,
हर दो दिन में खराब हो जाती है।
छोटी बेटी भी कुछ नहीं समझती,
खिलोने देखते ही बेताब हो जाती है।
सुना है दूध के दाम,
फिर से बढ़ने वाले है।
मकान की मरम्मत भी करनी होगी,
बादल अब चढ़ने वाले है।
तीन महीने पहले सुना था कि तनख्वाह बढ़ेगी,
मगर अब तो ये एक दिवास्वप्न सा लगता है।
और हर सप्ताह महंगाई बढ़ना,
एक रस्म सा लगता है।
सोचता हूँ गाँव की ज़मीन बेच दूँ,
कुछ पैसे हाथ होंगे।
घर से भी बटवारे का जोर है,
सोचा था भाई जीवन भर साथ होंगे।
खैर अब कौन किसका साथ देता है,
ज़माना खुदगर्ज़ सा हो चला है।
सबकी मदद करना,
एक मर्ज़ सा हो चला है।
और मैं दोष भी किसको दूँ,
तबसे मैं भी खुद के लिए ही तो परेशान हूँ।
तो फिर कैसे मान लूँ कि,
मैं एक उम्दा इंसान हूँ।

Friday, February 17, 2017

रिमोट कहाँ है?

हम देखते है भूख में बिलखते किसी बच्चे का रोना,
और चैनल बदल लेते हैं।
हम देखते है किसी मासूम की अस्मिता का खोना,
और चैनल बदल लेते हैं।
हम देखते हैं किसी बेबस गरीब का असहज बिछौना,
और चैनल बदल लेते हैं।
 हम देखते हैं भ्रष्ट राजनीती का रूप घिनौना,
और चैनल बदल लेते हैं।
हम देखते है देश के प्रहरियों का मौत की नींद सोना,
और चैनल बदल लेते हैं।
हम देखते है संसद को बनता एक खिलौना,
और चैनल बदल लेते हैं।
हम देखते है महंगाई का सातवे आसमान पर होना,
और चैनल बदल लेते हैं।
हम देखते है किसी कि खूबसूरती को तेजाब से भिगोना,
और चैनल बदल लेते हैं।
प्रश्न ये है कि,
असख्य चैनल बदलने वाले हम,
क्या इस प्रवृति से बाज़ नहीं आएँगे।
कहीं जब हमारे साथ कुछ अनहोनी हुई,
तो अपनी ज़िन्दगी का चैनल बदलने वाला रिमोट,
हम कहाँ से लाएँगे?